By | February 20, 2023

Baap Beti Ki Chudai: हैलो दोस्तो, मेरा नाम स्वाति है , पिछले भाग मे आपने पढ़ा था कैसे मैंने पापा के मज़े लिए थे और अब आगे
पापा के साथ मेरी बदमाशी भरे खेल में मुझे काफी मज़ा आ रहा था, जिस तरह से मैंने उनकी छुपी नियत के साथ खेली, उसमे मुझे एक अजीब सी मस्ती मिल रही थी।

Baap Beti Ki Chudai

वैसे भी मर्दो को तरसाने वाली खेल में तो मैं माहिर ही थी, मेरी टी-शर्ट पूरी गीली थी पानी गिरने से मेरी निप्पल तो मानो नुकीली होकर टी-शर्ट फाड़ने वाले थे, साफ़ था की पापा को मेरे बूब्स की आकर टी-शर्ट पर दिख रहे थे॥

मैं उनके सामने खड़ी होकर बोली: कितना ओवर बाकी है?पापा: अभी तो सेकंड इनिंग शुरू ही हुआ है 2 ओवर ही हुआ है 18 बाकी है मैं उठ खड़ी हुई और उन्हें देख नादान बनती हुई बोली: तब तो अभी बहुत टाइम है खेल ख़त्म होने में और अगर मैं इस गीली टी-शर्ट में रही तो शायद बुखार हो जाये।

मेरी बात सुन पापा मुझे आँख फाड़ कर देखने लगे शायद वह सोच रहे थे की कही मैं उनके सामने अपनी टी-शर्ट न उतार फेकू, मैं उन्हें देख मुस्कुराती हुई पलटी और कमर लचकाती हुई अपनी छोटी स्कर्ट से जांघो की अच्छा प्रदर्शन करती हुई अपने कमरे को चल पड़ी।

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रूम जाकर दरवाज़ा बंद किया और अपनी टी-शर्ट निकाल फेकी और अलमारी से दूसरी टी-शर्ट निकाली और उसे पहन लिया वैसे तो मेरी स्कर्ट ज़्यादा गीली नहीं हुई थी, लेकिन कुछ ज़्यादा सोचा नहीं और स्कर्ट खोल फेकि और एक पेंटी पहनकर पापा के अरमानो के साथ खेलने निकल पड़ी।

पापा टीवी के तरफ देख रहे थे और उन्हें पता नहीं चला की मैं उनके पास आ गयी जैसे ही टीवी की रौशनी में उन्हें मेरे पास होने का एहसास हुआ तो वह मेरी तरफ देखा फिर उनकी आँखे फटी की फटी रह गयी, मैं उनके सामने सिर्फ टी-शर्ट और पेंटी में खड़ी थी।

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टी-शर्ट इतनी भी बड़ी नहीं थी वह सिर्फ मेरी नावी से थोड़ी नीचे तक की लम्बाई की थी इससे उन्हें मेरी पेंटी साफ़ दिख रही थी।

मेरे पास लम्बी वाली टी-शर्ट तो थी पर अच्छा हुआ की मेरे हाथ ये लगी॥

मैं: क्या हुआ? आप ऐसे क्यों देख रहे है?

पापा: नहीं कुछ… अचानक आयी तो घबरा गया

मैं: क्यों? आपको क्या लगा की भूत आ गया? है है है!

पापा: नहीं वह नहीं… तुम्हारी स्कर्ट कहा गयी?

मैं: वह तो मैंने निकाल दी गीली थी।

पापा: तो दूसरी पहन ले।

मैं: वह… बाकि सब वाशिंग मशीन में है धोने के लिए डाली तो थी पर ऑन करना भूल गयी।

पापा: हम्म हम्म… ठीक है ठीक है।

मैं तब अपनी टी-शर्ट की निचले हिस्से से अपनी पेंटी छुपाती हुई बोली: ये एक ही धूलि हुई टी-शर्ट मिली वह भी छोटी निकली, पापा गले से थूक का निवाला गटकते हुए बोले: हां… हाँ वह तो है।

मैं फिर बच्चो की तरह हस्ती हुई पापा के बगल में बैठी और बोली: वैसे भी कोई तो है नहीं तो फिर कोई प्रॉब्लम नहीं है मैं ऐसे बैठी की मेरी नंगी जंगों उनके पायजामे के ऊपर से उनकी जांघो को रगड़ती हुई चिपक गयी फिर अपनी टांग सामने की टेबल पर सीधी रख कर बैठ गयी और उनके साथ मैच देखने लगी।

कुछ देर के लिए सन्नाटा ही छा गया, पापा के तो मानो मैंने बोलती ही बंद कर दी थी,

इतने में पापा बोले: आज क्या हुआ तुम यहाँ आ गयी हमेशा तो अपने रूम से निकलती भी नहीं हो।

मैं ये तो कह नहीं सकती थी की पापा को तरसने का खेल खेलने आयी हु तो बोली: वह आज मम्मी नहीं है ना।

वरना हमेशा उनका की तीर पिटिर लगा रहता है, मैं उनके हाथ को पकड़ उनके कंधे पर अपना सर रख आगे बोली: आप माँ जैसे नहीं हो उसी लिए आ गयी।

ऐसे उनके हाथ को अपने हाथ में ले कर तो मेरी बूब से उनका बाज़ू चिपक गया वह बोले: हाँ कभी कभी तुम्हारी माँ ज़्यादा बोल देती है।

मैं: कभी कभी क्या? जब देखो ज़्यादा ही बोलती है आपको उनके अलावा कोई और नहीं मिली क्या?

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पापा हसने लगे और मेरे सर पे अपने दुसरे हाथ से सहलाते हुए बोले: है है है! अरे पगली अगर तुम्हारी माँ से शादी नहीं करता तो तुम कहा से होती यहाँ।

मैं: हो ही नहीं सकता।

पापा: क्या नहीं हो सकता?

मैं: की आपने मम्मी से शादी की तो मैं हुई।

पापा: अरे! ये क्या बोल रही हो?

मैं: और नहीं तो क्या मम्मी कितनी बोरिंग है आदर्श तमीज भक्ति पूजा ये वह वह ये उफ्फ्फ और मुझे देखो, मैं जब बोली की मुझे देखो तो उनकी नज़र सीधी टीवी की रौशनी में चमकती मेरी चिकनी जांघो पर गयी।

तब मैं उनका चेहरा पकड़ अपने तरफ देखती हुई उनको बोली: ओफ्फो पापा वह नहीं यहाँ मुझे देखो, मेरे ऐसे बोलने पर वह थोड़े घबरा गए और मुझे देख बोले: हाँ हाँ देखा।

मैं: क्या दिखा? क्या मुझे देख ऐसा कुछ भी है जो उनसे मिलती है?

पापा: अब मैं इसमें क्या बोलू?

मैं: मेरी आदत उनसे नहीं मिलती मेरी शकल उनसे नहीं मिलती और तो और ये देखो इतना कहती हुई मैं सोफे से उठी और उनके सामने अपनी कमर पर हाथ रख खड़ी हो गयी उनके सामने बस एक छोटी टी-शर्ट और पेंटी में खड़ी उन्हें अपनी टाँगे पूरा खुले आम दिखती हुई बोली: मेरी फिगर भी उनसे नहीं मिलता देखो मिलता है क्या।

पापा मुझे ऊपर से नीचे हड़बड़ाते हुए 3 बार देखा पर मानो गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मैं: बोलिये ना क्या मेरी फिगर माँ जैसी है?

मैं तुरंत पलट गयी उनको अपना पिछला हिंसा दिखाती हुई सर मुड़कर उन्हें देख बोली: देखिये और बोलिये लगती हु क्या उनके जैसी।

पापा हिमत लगा कर अपने गले से आवाज़ निकाल बोले: ओके ओके माना नहीं लगती हो अब बैठो इधर वापस।
मैं: हम्म तो अब बताइये क्या मैं उनकी बेटी हु?

पापा: ऐसे नहीं बोलते वह बस तुमको लेकर बहुत चिंता में रहती है तुम नहीं समझोगी अभी।

मैं: हाँ हाँ आपने पहले भी यही कहा था।

पापा मेरे नाक को अपनी ऊँगली से दबाते हुए लाड से बोले: जब तुम्हारी भी तुम्हारे जैसी एक शैतान बेटी होगी तब समझोगी तुम।

में: अच्छा तो मैं शैतान हु?

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पापा: है है है! और नहीं तो क्या शैतान की अम्मा हो तुम।

मैं उनकी हाथ को चिति काटा ओर बोली: उस हिसाब से तो आप शैतान के नाना हुए है है है!हम दोनों हसने लगे और उनकी जिस हाथ पर चींटी काटी उसे लेकर उसकी हथेली अपनी जांघ पर रखा और काटी हुयी जगह को सहलाने लगी पर ये तो मेरा मासूमियत भरा बहाना था उनके हाथ को मेरी जांघ पर रखने के लिए।

मैं कुछ आगे बोली नहीं ना ही पापा ने अपना हाथ हटाया ओर थोड़ी देर के लिए फिर से चुप्पी हो गयी.

फिर मैं बोली: वैसे पापा.

पापा: ओफ्फो फिरसे शुरू

मैं: आपने मम्मी के साथ मिलकर मुझे बनाया कैसे?

पापा: माँ… मतलब बनाया कैसे मतलब?

मैं: मतलब की वह इतनी धार्मिक टाइप उनके साथ हुआ कैसे.

पापा: की… क्या हुआ कैसे.

मैं: ओफ्फो कुछ नहीं.

पापा: तुम पागल हो गयी हो जाकर सो जाओ.

मैं: मैं पागल नहीं आप बुड्ढे हो गए हो.

पापा: अच्छा मैं बुद्धा?

मैं: और नहीं तो क्या.

पापा: क्यों मैंने ऐसा क्या किया.

मैं: कुछ पूछ तो आपको समझ तो आता नहीं बुद्धो वाले विचार हो गए है आपके मम्मी ने आपका भी दिमाग ख़राब कर दिया अपने साथ.

पापा: क्या पूछा तुम पूछो।

मैं: यही की अपने माँ के साथ मिलकर किया कैसे।

पापा: देखो तुम ये सब मुझसे नहीं पूछ सकती बेटा ।

मैं: क्यों? तो और किस्से पूछू? किसी और से पूछ लू?

पापा: नहीं! किसी से नहीं और हमने कुछ नहीं किया तुम तो हमें आसमान से मिली थी।

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मैं सीधे उनके मुँह देख बोली: ओफ्फो पापा मैं 2 क्लास की बच्ची नहीं हु मुझे भी पता है बच्चे कैसे होते है हँ!झूठा गुस्सा दिखाती हुई,

मैं तुरंत उनके गोद में रखा तकिया खींच लिया जैसे ही तकिया हटा तकिये के नीचे दबा उनका लंड पायजामे में टैंकर ज़ोर का झटका दे मारा।

वह हड़बड़ा गए उसे छुपाने के लिए, लेकिन मैंने उन्हें मौका नहीं दिया और सीधे अपना सर उनकी गोद में ठीक लंड के पास रख मासूमियत का झूठा रंग दिखाती हुई सोफे पर टीवी देखती हुई लेट गयी।

पापा की मजबूरी थी की वह कुछ न कर सकते थे न बोल सकते थे और इसका मैं मज़े से फायदा उठा रही थी।
मेरे सर के नीचे उनका सख्त लंड दबा हुआ था और उनके न चाहते हुए भी हलके झटके मार रहा था मैं बस नादान सी बच्ची बनी टीवी देखती रही और मन ही मन मुस्कुराती भी।

पापा: नींद आ रही है तो अंदर जाके सो जाओ बेटा।

मैं: नहीं आ रही, मैं अपने सर से हल्का दबाव उनके पायजामे में छुपे लंड पर देती हुई आगे बोली: अब तो आएगी भी नहीं मुझे।
पापा घबराते हुए बोले: मतलब! क्यों नहीं आएगी?

मैं: मतलब की मैच देखते है ना नींद क्यों आएगी।

पापा: हाँ… हाँ हाँ! मैच हम्म!इतने में पापा थोड़ा आराम लेते हुए अपना एक हाथ नीचे मेरे कंधे पर रखे तो वह मैं चरण पकड़ कर अपने सीने से लगा ल्या ओर नादान बच्ची की तरह उनका हाथ पकड़ कर सीने से लगाना भी बहाना ही था ऐसे करके मैंने उनका हाथ सीधे अपनी टी-शर्ट के ऊपर से अपनी बूब पर रख दिया,

उनके लंड ने मेरे सर के नीचे एक और हल्का झटका मारा मैं समझ गयी की उनकी उत्तेजना पर एक और चोट लग गयी थोड़ी देर बाद मैंने उनका हाथ अपने बूब पर चोर अपने सर के नीचे रख आराम से लेट गयी,

अब मेरी हथेली मेरे सर और उनके लंड के बीच में थी

मेरे हथेली पर उनके सख्त लंड का स्पर्श अच्छे से हो रहा था अब जाकर पहली बार मुझे उनके लंड के अकार का सही अनुभव हो रहा था ।

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पापा की तो मनो सांस ही अटक गयी थी शायद वह कोशिश में थे की उनका लंड कही ज़्यादा ज़ोर के झटके ना मारे, मैं भी कुछ कम नहीं थी ,

मैंने अपनी उस हथेली के अंघूठे को काफी धीरे से हिलाना शुरू किया मानो जैसे जान कर नहीं बस मेरी उंगलिया मचल रही हो खुद से अंघूठे को धीरे से हिलती हुई जब मैं उनके सख्त लंड को पायजामे के ऊपर से सहलाई तो उसके असर से उनका हाथ मेरे बूब को हलके से दबा गया, मैं समझ गयी की पापा के तन बदन में मेरे हरकत से करंट दौड़ रहा था,धीरे धीरे अंघूठे से मैं उनके लंड को सहलाती रही और उनकी उंगलिया भी मेरी बूब पर वैसे ही धीरे धीरे सहलाने लगी एक पल ऐसा आया जब मेरे अंगूठे की नाख़ून मैंने उनके लंड पर हलके से दबा कर चुभा दिया ।

वह मेरी बूब को थोड़ी और ज़ोर से दबा गए मैं कुछ नहीं बोली इससे अब उनको भी पता था की अगर वह मेरी बूब को दबाये तो मैं ध्यान नहीं दूंगी इसके बाद शुरू हुआ हम दोनों का छुपेरुस्तम खेल।

मैं अपने से उनको उत्तेजित करती हुई उनका लंड सहलाती और वह मेरी बूब दबाते हुए मुझे हर बार पिछले बार से थोड़ा ज़्यादा मेरी निप्पल सख्त होती हुई टी-शर्ट से उनके हाथ पर चुबने लगी।

वह उसे मज़े से सहलाने लगे मेरी अंघूठे की भी बदमाशी भरी मचलाहट बढ़ चुकी थी इसका असर उनके लंड पर अच्छे से हो रहा था।

अब उनका लंड मेरी हथेली पर झटके पे झटके मार रहा था और अब ऐसा लग नहीं रहा था की वह उसे रोकने की कोई कोशिश भी कर रहे हो।

ऐसे ही थोड़ी देर के बाद बाकी उंगलियों से उनके लंड के अकार को दबाने भी लगी वही पापा भी अब अपने हाथ की उंगलिया मेरे टी-शर्ट पर तनी निप्पल को टटोलने लगे, नादानी का खेल अब सिर्फ मैं नहीं वह भी खेल रहे थे और इसमें यकीनन मेरे साथ अब उन्हें भी मज़ा आ रहा था।

सोच ही रही थी की अब आगे कैसे बढ़े की तभी एक विकेट गिरी मुझे तो पता भी नहीं की कौनसी टीम खेल रही है और कौन सी जीत रही है।

बस मौका मिला और मैं उनके लंड को ज़ोर से दबाती हुई “येह!” बोल पड़ी वह सहम उठे और साथ ही उनकी उंगलियों ने मेरे निप्पल पर कहर बरसा दिया।

टी-शर्ट के ऊपर से ही उन्होंने बदले में मेरी निप्पल को अच्छे खासी निचोड़ डाली दर्द और मस्ती का करंट मेरी निप्पल से होती हुई मेरे बदन में दौड़ गया।

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पर अब न ही मैं उनके लंड से पकड़ छोड़ रही थी न ही वह मेरे निप्पल से कुछ सेकंड हम दोनों ऐसे ही रहे और फिर ढील देने लगे, पर इसके बाद से मेरी हथेली उनके लंड को और थोड़ा ज़ोर से दबाया और सहला रही थी।

वह भी वही कर रहे थे मेरी निप्पल के साथ सच बताऊँ तो सब इतना धीरे हो रहा था अगर ये मेरे पापा न होते तो इनका लंड लेकर में अब तक अपने मुँह में ले लेती और शायद वह भी सोच रहे होंगे की अगर मैं उनकी बेटी न होती तो अब तक वह मुझे पटक कर चोदना शुरू कर देते।

उत्तेजना की आग हम दोनों में भड़क रही थी पर सैयाम कोई खोना नहीं चाहता था मैं नहीं चाहती थी की मैं उनके सामने इतनी गिर जाओ और न ही वह ये चाहते थे।

इस एक कारन हम दोनों ही अपने अपने काबू में सब कर रहे थे थोड़ी देर यही हुआ और फिर मैं अपने दूसरे हाथ अपने पेट के पास ले गयी और अपनी टी-शर्ट उठाकर अपना पेट खुजलाने लगी बस एक और बहाना मेरे टी-शर्ट को थोड़ा ऊपर उठाने के लिए।

इसके बाद मैं थोड़ी अपनी कमर को मचली मानो काफी देर से ऐसे रहने से मेरी बदन अकड़ रही हो फिर आराम के लिए अपनी जांघो को फैला कर लेट गयी अब मेरी टाँगे पूरी फैली हुई थी और पापा को उपर से मेरी पेंटी का खुला नज़ारा मिल रहा था।

उनकी उंगलिया काफी मज़े से मेरी टी-शर्ट पर उभरी निप्पल को सहलाती तो कभी मसल रही थी थोड़ी देर बाद मैं अपना हाथ अपने पेट से और थोड़ी नीचे अपनी पेंटी के इलास्टिक के पास ले गयी फिर उंगलियों को थोड़ा अंदर डालती हुई अपनी चूत के बालो के हिस्से पर खुजलाने लगी, ज़्यादा अंदर नहीं ले गयी और हाथ को वही पेंटी के अंदर रख हलके हलके खुजलाती रही।
मेरी आँखे टीवी के तरफ ही थी पर दिमाग पापा पर यकीनन वह तो टीवी नहीं देख रहे थे उनकी नज़रे तो मेरी नादान हरकतों पर थी जिसका असर मुझे मेरी निप्पल पर उनकी उंगलिया बता रही थी।

वही दूसरी तरफ मेरा दूसरा हाथ अब भी पापा के लंड पे था उनका लंड पायजामे के अंदर से हर पल और ज़्यादा सख्त और गर्म महसूस हो रही थी जैसे जैसे हर पल गुज़रा पेंटी के अंदर मेरी उंगलिया धीरे धीरे और अंदर जाने लगी, इतना धीरे के शायद ही पता चले की मेरी उंगलिया अंदर बाहर हो रही हो देखते ही देखते कुछ देर बाद मेरी ऊँगली ठीक मेरी चूत के दाने पर आ गयी, बिना ज़्यादा हिले डुले एक हाथ से पापा के लंड को सहलाती तो वही दूसरी हाथ से अपनी चूत के दाने को पेंटी के अंदर सहलाने लगी।

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पर ऐसा भी नहीं था की पापा को पता नहीं चला की मेरे हाथ पेंटी में क्या गुल खिला रहा है वह अब मेरी निप्पल को टी-शर्ट के साथ ही हलके दबाव के साथ मसल कर खींचने भी लग गए।

मुझे काफी मज़ा आ रहा था मेरी हथेली भी अब उनके लंड के सिरे पर पहुँच चुकी थी

अपनी उंगलियों को मचलती हुई उनके लंड के सिरे को पायजामे के साथ सहलाती और दबती हुई उन्हें भी मज़ा दे रही थी।
कुछ ही पल बाद मेरी उन उंगलियों पर हलकी फिसलाहट महसूस हुई तो समझ गयी की पापा के लंड से उत्तेजना की बूंदे उनके पायजामे को गीली करती हुई मेरी उंगलियों पर लग रही थी।

मैं इन सबसे अनजान बनने का ढोंग किया ओर अपनी उंगलियों से उनके लंड के मुँह पर और अच्छे से सहलाने लगी काश की मैं अपनी उंगलियों को अभी एक बार चख के जान पाती की पापा का स्वाद कैसा है।

पर ऐसा करती तो हम दोनों के इस अनजान बनने के खेल का मज़ा ही ख़त्म हो जाता, कुछ देर हम दोनों की चुप्पी के साथ यही खेल चलता रहा, फिर मैं बोर होने लगी पापा ने अचानक से पूछा : स्वाति।

मैं सर उठाकर उन्हें देख बोली: हाँ पापा।

पापा: तुम्हे ठण्ड नहीं लग रही है क्या?

मैं: क्यों? ठण्ड क्यों लगेगी रूम हीटर तो ऑन है न।

पापा: हाँ पर बस ऐसे एक टी-शर्ट में वह भी दिसंबर महीने में।

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मैं तब मुस्कुराती हुई बोली: अरे पापा रूम हीटर ऑन होने पर भी आपको ठण्ड लगती होगी मुझे नहीं।

पापा: नहीं नहीं मुझे भी उतनी ठण्ड नहीं लग रही मैं बस पूछ रहा था

मैं झट से पूछी: अच्छा तो आपको ठण्ड नहीं लगती तो ऐसे हमेशा फुल स्लीव शर्ट और पायजामे में क्यों रहते हो?

पापा: अरे तो और क्या पह्नु?

मैं तब सोची की इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा और बोली: मुझे देखिये ना यहाँ हु वर्ण अभी अपने रूम कम्बल के अंदर होती

ये टी-शर्ट भी निकाल देती।

पापा का लंड मेरी बात पर नीचे से मेरे सर पर एक झटका दे मारा।

पापा: क्या? हैट कुछ भी बोलते रहती हो।

मैं: सच्ची पापा अभी तो आप हो यहाँ वरना अगर मैं अकेली यहाँ टीवी देखती तो ये पेंटी भी नहीं पहनती।

पापा हैरानी के साथ पूछ उठे: तो?

मैं: सिर्फ ये टी-शर्ट पहनी रहती रात को वैसे भी मैं कोई इनर नहीं पहनती।

पापा: ठीक है ठीक है ये सब मुझसे नहीं बोलना चाहिए तुम्हे।

मैं नादान सी होती हुई बोली: क्यों? आपसे क्यों छुपाऊं? आप कोई और तो नहीं मेरे पापा ही हैना।

पापा: हाँ बेटा पर तुममैं उन्हें टोकती हुई अपनी पेंटी से हाथ निकाला और पेंटी की इलास्टिक खींचती हुई बोली: ये इसका जो ये इलास्टिक है वह काफी टाइट रहता है नीसान पड़ जाती है उसी लिए मैं ये अपने रूम में होती हु तो नहीं पहनती।

पापा: ओके ओके ठीक है वह बात को ख़त्म करने की कोशिश में थे।

जब मैं पूछी: आप अभी पहने हो क्या?

पापा: क्या?

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मैं: अंडरवियर ये तो अब तक वह भी जान गए थे की मुझे पता है की वह पायजामे के अंदर और कुछ नहीं पहने है शायद इसी लिए वह बोले: न… नहीं पहना हु।

मैं: अच्छा और बड़े आये मेरे को बोलने हँ।

पापा: है है है! तो क्या हुआ मैंने पायजामा तो पहना है न तुम्हारे तरह मैं जवाब के लिए हक़ जताते हुए बोली: मेरे तरह क्या बोलिये? हम्म हम्म बोलिये?

पापा: अरे कुछ नहीं बाबा तुमसे बात करके मैं नहीं जीतने वाला।

मैं: बात मत बदलिए बताइये मेरे तरह क्या बोलिये।

पापा मेरे सर को सहलाते हुए बोले: तुम्हारे तरह सिर्फ टी-शर्ट में तो नहीं हु न।

मैं: अच्छा! और ये पेंटी क्या दिख नहीं रही आपको।

पापा: हाँ हाँ दिख रहा है बाबा गलती हो गयी।

मैं: खुद तो पहनते नहीं अंडर वियर और मुझे बोल रहे है तुरंत मैं अपने एक हाथ से अपनी पेंटी की इलास्टिक पकड़ उसे नीचे खींचती हुई निकालने लगी तो वह बोले: ये क्या… क्या कर रही हो।

मैं: क्यों आपने भी तो नहीं पहना तो मैं क्यों पहनु?

उनकी गोद से सर न हटाती हुई वैसी ही लेती मैं पीठ के बल अपनी कमर उठायी और अपनी पेंटी सरकाती अपने पाँव से निकाल कर उनके छाती के तरफ फेक कर बोली: लो हँ मुझे भी नहीं पहननी अंडर वियरवह मेरी पेंटी हाथ में लेकर मुझे देते हुए बोले: पागल लड़की लो पहनो इसे वापस।

मैं झूठा गुस्सा दिखा कर उनके हाथ को हटाती हुई बोली: आप ही रखो इसे मुझे नहीं पहननी और ऐसा बोलती हुई मैं अपनी जांगे फैलाकर सोफे पर आराम से उनके गोद में सर रख टीवी के तरफ देखने लगी।

अब टीवी की रौशनी में उन्हें मेरी खुली जांघो के बीच मेरी मुलायम चूत के फूले हिस्से का अकार साफ़ दिख रहा था ।
इसका असर उनके लंड पर होने लगा जो अब कई बार मेरे सर पर नीचे से धक्के मार रहा था इस बेशर्म भरी हरकत ने मेरे अंदर मस्ती की लहार उछाल दी।।

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मैं अपने पापा के सामने बिना पेंटी के अपनी टैंगो को फैलाकर हद बेशर्मी के साथ लेती हुई थी।

वह भी उनके लंड पर अपना सर रख इससे ज़्यादा मैं क्या करती उन्हें उत्तेजित करने के लिए?

वह चुप चाप बैठे इन सब को हज़म करने की कोशिश करने लगे की तभी घंटी बजी ज़रूर माँ थी मैं झट से उठ खड़ी हुई तो पापा मुझे पेंटी देने लगे जो अब भी उनके हाथ में ही थी।

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मैं हड़बड़ाती हुई सोफे से उठकर अपने रूम को चलने लगी और बोली: टाइम नहीं आप छुपालो इसे कल ले लुंगी।

मैं अपने रूम को भागी और अपने कमरे में घुस गयी डोर बंद कर अपने बेड पर गिरती हुई सोचने लगी की क्या से क्या हो गया और अब आगे क्या क्या होने वाला था बेटी और पापा के बीच,वैसे पेंटी उनसे न लेने का भी बहाना ही था बस चाहती थी की आज रात वह पेंटी से अपनी बेटी की चूत की खुशबू का मज़ा ले.
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